Monday, October 26th, 2026

बैंक गारंटी फर्जी, 15 करोड़ ले उड़ा झारखंड का ठेकेदार

भोपाल
आबकारी विभाग में एक बार फिर फर्जी बैंक गारंटी से शराब ठेका लेने का मामला सामने आया है। इस बार फिर यह करोड़ों का घोटाला प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में हुआ है। इसमें आबकारी विभाग के दो बड़े अफसरों की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है। ठेकेदार ने अफसरों के साथ सांठगांठ कर न सिर्फ साढ़े चार करोड़ रुपए की फर्जी बैंक गारंटी लगाई, बल्कि उससे विभाग ने धरोहर राशि जो 78 लाख रुपए है वह भी जमा नहीं करवाई।

इतना ही नहीं ठेकेदार ने तीन महीने तक दुकान से शराब बेची और शुल्क के भी करोड़ों रुपए हजम कर लिये। जब यह मामला सामने आया, तब तक वह ठेकेदार दुकान बंद कर भाग गया। अब विभाग के अफसर करोड़ों के इस घोटाले को दबाने में लगे हुए हैं। इस पूरे मामले में इंदौर के आबकारी विभाग के डिप्टी कमिश्नर संजय तिवारी और असिस्टेंट कमिश्नर राजनारायण सोनी की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।

झारखंड के एक शराब ठेकेदार ने इंदौर के  एमआईजी की शराब दुकान नीलामी प्रक्रिया में ली थी। नियम के मुताबिक ठेकेदार को विभाग को 4.62 करोड़ की बैंक गारंटी और 78 लाख की अर्नेस्ट मनी जमा करना थी। जो उसने अफसरों से साठगांठ कर जमा नहीं करवाई। बैंक गारंटी की जांच के बिना ही झारखंड से आए इस ठेकेदार को शराब दुकान आवंटित कर दी। फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ठेकेदार ने करीब तीन महीने तक अपने दुकान से करोड़ों की शराब बेच दी और इसके बाद वह अचानक गायब हो गया। ठेकेदार के अचानक भाग जाने से विभाग में हड़कंप मच गया। इसके साथ ही इस मामले ने तूल पकड़ लिया।

ठेकेदार भागने के बाद की दस्तावेजों की जांच
ठेकेदार के भागने के बाद अफसरों ने अपने आप को बचाने के लिए इसके दस्तावेजों की जांच करवाई। जिसमें 4 करोड़ 62 लाख रुपए की बैंक गारंटी फर्जी पाई गई। इतना ही नहीं जब बैंक गारंटी के दस्तावेज लगाए गए थे, तब असिस्टेंट कमिश्नर आबकारी इंदौर राजनारायण सोनी ने इसका सत्यापन नहीं किया। इसके अलावा इस ठेकेदार से आबकारी विभाग के अफसरों ने 78 लाख रुपए की धरोहर राशि भी नहीं ली थी। फर्जी बैंक गारंटी और धरोहर राशि जमा नहीं करने के बाद इस ठेकेदार ने शराब बेची लेकिन लाइसेंस फीस और अन्य शुल्क जमा नहीं किया। लाइसेंस शुल्क के उस पर 15 करोड़ रुपए बकाया हो गए थे।

दस्तावेजों की पड़ताल बिना कैसे आवंटित हुई दुकान?
इस पूरे मामले में राजनारायण सोनी और संजय तिवारी की कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। राजनारायण सोनी ने दुकान आवंटित करने से पहले बैंक गारंटी के दस्तावेजों की जांच क्यों नहीं करवाई। साथ ही बिना अर्नेस्ट मनी जमा किए कैसे दुकान का संचालन ठेकेदार को सौंप दिया? इसके अलावा लायसेंस फीस और अन्य शुल्क जो शराब बिक्री पर विभाग को लेना चाहिए था, वह क्यों नहीं वसूला गया। आखिर  क्या वजह थी जो झारखंड से आए ठेकेदार पर विभाग विशेष मेहरबानी दिखा रहा था। संजय तिवारी ने भी अपनी भूमिका नहीं निभाई। उन्हें जब इस मामले की जानकारी मिली, तब उन्होंने अपने मातहत राजनारायण सोनी को न कोई नोटिस दिया और न ही मामले की जांच कराई। एक तरह से तिवारी ने भी सब जानकारी होने के बावजूद मामले में चुप्पी साधे रखी।

लोकायुक्त की नजर
सूत्रों की मानी जाए तो इस घोटाले पर राज्य की आर्थिक मामलों की जांच करने वाली एजेंसी की भी नजर है। ईओडब्ल्यू ने भी इस मामले की जानकारी जुटाना शुरू कर दिया है। इधर लोकायुक्त संगठन भी इस मामले को संज्ञान में ले सकता है। इंदौर की दोनों ही आर्थिक मामलों की यूनिट इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए हैं। गौरतलब है कि आबकारी विभाग के कुछ अफसरों पर लोकायुक्त पुलिस के छापे पड़ चुके हैं।

 

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Source : Agency

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