युद्ध
दीप्ति श्रीवास्तव
किसकी हार किसकी जीत
मानवता किसे पुकारे
कौन अपना कौन पराया
कौन सही कौन गलत
अपने-अपने चश्मे
जीवन भी इक जंग है
पल पल लड़ना होता
रोजमर्रा की जद्दोजहद से
कभी परिस्थितियों से
तो कभी मंहगाई से
तो कभी की जरुरतों से
तजुर्बा उस जंग में
भारी पड़ता
निकाल लें आता
विषमताओं के बीच से
मन-मस्तिष्क में भी होती जंग
कुविचारों और सुविचारों की
जिसका पलड़ा भारी होता
वह राज करता
शरीर पर वैसा ही असर दिखाता
अपना रंग छोड़ जाता
पीढ़ियों के बीच होती जंग
विचारों की खाई पाटने
अदृश्य प्रेम डोर बांधने जुटती
पकड़ ठहर रिश्तों को जाती
बचाने अंततः सफल हो जाती
अपना घर अपना देश
परोपकार का समय नहीं
अपना हित जिसमें
अपना चूल्हा बड़ा भला
यही हमारे हित में ।

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