आकाशवाणी के कवि सम्मेलन में हुई काव्य रस वर्षा
( अमिताभ पाण्डेय)
भोपाल।
आकाशवाणी भोपाल ने जी 20 की भारत की अध्यक्षता के उत्सव को मनाने की श्रृंखला आज कवि सम्मेलन का आयोजन किया।
इसमें मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों से आए सुप्रसिद्ध कवियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को आनंदित कर दिया।
इस कवि सम्मेलन में युवा ओजस्वी कवियो की देशभक्ति से ओतप्रोत रचनाओ ने खुब तालियां बटोरी।
वीर रस के सुप्रसिद्ध कवि वेदव्रत वाजपेई , मदन मोहन समर , देश-विदेश में भोपाल का नाम रोशन करने वाली गीतकार डॉ अनु सपन की रचनाएं बहुत पसंद की गई।
भोपाल की कवियित्री सीमा शिवहरे ने श्रृंगार रस बिखेरते हुए कहा
" मेरे पैरों में पायल है जो हर पल ही छनकती है।
मेरे हाथों की चूड़ी भी तेरी ज़िद पर खनकती है "
चंदेरी से आये मशगूल मेहरबानी ने अपने गहरे अर्थ वाले मुक्तकों से खूब वाह वाही लूटी :
" आज जो ख़ुश है बिछड़ने पे कभी मेरे बग़ैर
एक लम्हे के गुज़रने को सदी कहता था "
" कैसे कर लूँ मैं यक़ीं दूर नहीं जाओगे
तुम से पहले भी कोई था जो यही कहता था "
भोपाल की कवियत्री नम्रता नमिता ने अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया
" जिसने अपना सारा सुख बच्चों के कल में देखा है
और कोई भी तमगा न उसके प्रतिफल में देखा है
मूर्ख है वो जो दुनिया मे ज़न्नत को ढूंढा करते हैं
मैने जन्नत को अपनी माँ के आँचल में देखा है "
शाजापुर निवासी हास्य व्यंय के विख्यात कवि अशोक नागर अपनी हास्य रचनाओं से सुनने वालों को गुदगुदाया
" बोल मीठे ना हो तो हिचकियां नहीं आती
कीमती मोबाइल में घंटियां नहीं आती
घर बड़ा हो या छोटा गर मिठास ना हो तो
आदमी क्या आएंगे चीटियां नहीं आती "
लखनऊ से आये वीररस के विख्यात कवि वेदव्रत वाजपेयी ने जैसे ही अपनी देशभक्ति गीतों की प्रस्तुति आरंभ की पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उन्होंने कहा
" सर्जना है सिंधु की घनों की गर्जना है घोर।
आंधियों के जोर शोर से लगी लगाम है।
देवता भी जिस देश की प्रशस्ति बांचते हैं।
ऐसी वरदानी मातृभूमि को प्रणाम है "
श्री वाजपेयी ने राष्ट्र आराधना के स्वर को ऊंचाई देते हुए कहा
" देश नहीं बनता है मिट्टी गिट्टी ईट मकानों से।
मां का मस्तक ऊंचा होता बेटों के बलिदानों से "
अपनी कविताओं से देश विदेश में भोपाल का नाम रोशन करने वाली विख्यात गीतकार डॉ. अनु सपन ने अपने गीतों से श्रोताओ को झूमने पर मजबूर कर दिया
" मुश्किलों से हमें जूझना आ गया।
हारते हारते जीतना आ गया।
देश नहीं बनता है मिट्टी गिट्टी ईट मकानों से।
मां का मस्तक ऊंचा होता बेटों के बलिदानों से "
वीररस के प्रख्यात कवि मदन मोहन समर ने अपने ओजस्वी स्वर में श्रोताओं के बीच जोरदार माहोल बनाया :
" हम इसकी रज में खेले हैं, हम इसीलिए अभिमानी हैं।
हम धन्य हुए हम गर्वित हैं, क्योंकि हम हिंदुस्तानी हैं "
कवि सम्मेलन का संचालन डॉ. रमेश श्रीवास्तव ने किया।
कार्यक्रम में स्वागत उद्बोधन कार्यक्रम प्रमुख विश्वास केलकर ने किया और आभार प्रदर्शन केंद्र प्रमुख यशवंत चिवन्डे ने किया।
इस अवसर पर आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी राजेश भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार चन्द्रहास शुक्ला समाचार संपादक संजीव शर्मा, योगेश नागर सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। इस आयोजन का यूट्यूब, फेसबुक पर सीधा प्रसारण किया गया।

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