विभागीय अनदेखी से जलस्त्रोत खत्म, धड़ल्ले से मिल रही निर्माण अनुमतियां
भोपाल
प्रदेश में दो दशक में सवा लाख जल स्त्रोत भू माफिया और अफसर जीम गए हैं। अब स्थिति यह है कि 2001 की जनगणना के वक्त प्रदेश में मौजूद ढाई लाख से अधिक जल स्त्रोतों में से एक लाख के करीब ही सुरक्षित बचे हैं। माफिया और अफसरों के गठजोड़ ने बड़े बांधों, तालाबों, नदियों को खत्म करने का काम किया है। सरकार जलस्त्रोतों की सुरक्षा के लिए जलाभिषेक अभियान चला रही है लेकिन जो जलस्त्रोत अवैध कब्जे के जरिये चुरा लिए गए या बेच दिए गए उनकी सुरक्षा को लेकर कोई बात नहीं की जा रही है।
शहरों में तालाबों को बड़ी इमारतों ने हजम कर लिया है तो जंगली इलाकों को छोड़ बाकी स्थानों पर झरनों का वजूद ही खत्म हो गया है और यही गहराते पेयजल संकट की सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है। वर्ष 2011 की स्थिति में प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में कुल जल स्त्रोतों की संख्या 1.77 लाख से अधिक थी जबकि शहरी इलाकों में बचे जलस्त्रोत जिसमें तालाब, झरना, नदियां, नहर, बांध भी शामिल हैं, उनकी संख्या 36081 थी। इस तरह प्रदेश में कुल जलस्त्रोत 2.13 लाख थे। इसमें से शहरी इलाकों के नदी, तालाब तो खत्म ही हो गए हैं और ग्रामीण इलाकों में भी इनकी संख्या 75 हजार के करीब ही शेष बताई जा रही है जिसमें से करीब पचास हजार के संरक्षण का काम किया जा रहा है।
पंचायत और ग्रामीण विकास का पुष्कर धरोहर अभियानदेगा तालाबों को संजीवनी
तालाबों, नदियों, झरनों, बांधों के खत्म होने के बीच पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग ने इसके लिए मजबूत प्रयास किए हैं। पुष्कर धरोहर अभियान के जरिये पुराने तालाबों और जल संरचनाओं को बचाने की कोशिश की जा रही है। विभाग ने इसके लिए 49 हजार जल संरचनाओं को चिन्हित किया है। इस पर 1100 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। पुष्कर धरोहर अभियान में पुराने तालाब, चेकडैम, स्टापडैम चिन्हित कर उन्हें जल संरक्षण के योग्य बनाया जा रहा है जो आसपास की आबादी की प्यास बुझाने के साथ सिंचाई में भी सहभागी बन सकते हैं। विभाग के अफसरों के अनुसार कई जलस्त्रोत तो मामूली राशि 50 हजार से डेढ़ लाख रुपए तक खर्च कर सुधारे गए हैं और 15 जून तक इसके लिए काम किया जा रहा है। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर हर जिले में 100 तालाबों के निर्माण को लेकर भी काम चल रहा है ताकि जलस्त्रोत विकसित कर पानी के भावी संकट को दूर किया जा सके।
नगरीय विकास विभाग ने नहीं की कोई पहल
जल संकट से बेपरवाह सरकार और अफसरों की लापरवाही का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि पंचायत और ग्रामीण विकास ने तो जल संरचनाओं को बचाने के लिए कोशिश भी की है पर नगरीय विकास विभाग को तो मानो इसकी चिंता ही नहीं है जबकि सर्वाधिक जल संकट शहरी इलाकों में है। नगरीय निकायों के अफसर खुद शहरों के दायरे में आने वाले जल स्त्रोतों को खत्म कराने में जुटे हैं और विकास के नाम पर इनके वजूद को दरकिनार कर बड़ी इमारतें खड़ी करने की परमिशन दे रहे हैं। नतीजा यह है कि शहरों से गुजरने वाली नदिया और यहां के तालाब वजूद खोते जा रहे हैं।
सतना जिले में मौजूद लिलजी बांध की क्षमता इतनी है कि पूरा भर जाए तो न सिर्फ रीवा बल्कि सतना के लिए भी पीने के पानी का बड़ा स्त्रोत बन सकता है। इस बांध को प्लानिंग के तहत राजनेताओं ने खत्म कराया और अब इसे औने-पौने दाम पर कब्जेदारों को बांटने की तैयारी है। इसको लेकर कई बार आवाज उठाई गई लेकिन सरकार ने चुुप्पी साध ली है। इसी तरह रीवा जिले में महाराजा होटल के पीछे स्थित झिरिया नदी का तो वजूद ही खत्म हो गया है। रायपुर कर्चुलियान के समीप बने तालाब को मिट्टी से भर दिया गया है। यह स्थिति सतना से बनारस के बीच पड़ने वाले सभी पुराने तालाबों के मामले में देखी जा सकती है।
भोपाल के बड़े तालाब की लाइफलाइन कलियासोत नदी सीहोर से होकर भोपाल आती है। इसके 36 किमी के बेल्ट में 24 लाख मीटर ग्रीन बेल्ट पर कब्जा कर आलीशान कोठियां और मकान बनाए गए हैं। एनजीटी ने इसके 33 मीटर की रेंज में आने वाले निर्माण तोड़ने का आदेश भी दिया लेकिन न सरकार को चिंता है और न ही अफसरशाही को कोई फिक्र है।
जबलपुर के बीचों बीच बहने वाली ओमती नदी कभी नर्मदा के साथ यहां के लोगों की धरोहर थी। अब शहरीकरण के नाम पर इस नदी को नाला बना दिया गया है। नागदा की नागदहन नदी देवास में नाला के रूप में परिवर्तित हो गई है। इसी तरह मंडला की बंजर और भिंड की बेसली नदियां कभी लोगों को पीने का पानी देने का मुख्य स्त्रोत थीं और अब ये नाले के रूप में बदल गई हैं।

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