वेदान्त ही वेदों का सार - स्वामी हरिब्रह्मेन्द्रानंद तीर्थ
भोपाल
आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा आयोजित शंकर व्याख्यानमाला में आदि शंकर ब्रह्म विद्या पीठ, उत्तरकाशी के स्वामी हरिब्रह्मेन्द्रानंद तीर्थ ने 'शरीरत्रय विवेक' विषय पर व्याख्यान दिया। स्वामी जी ने बताया कि वेदान्त ही वेदों का सार है। वेदान्त में आत्मसाक्षात्कार की, अपने वास्तविक स्वरूप को जानने की कई प्रक्रियाएँ बताई गई हैं, जैसे - कार्य कारण प्रक्रिया, अवस्थात्रय विवेक, पंचकोश विवेक, शरीरत्रय विवेक आदि। इन प्रक्रियाओं के माध्यम से वेदान्त अज्ञान की निवृत्ति करता है अर्थात अज्ञान को दूर करता है।
विवेक द्वारा करें अज्ञान का नाश
स्वामीजी ने बताया कि जीव अपने आप को न पहचानने के कारण स्वयं को शरीर मान बैठता है। इसको शास्त्रों में अध्यास कहा गया है - जो स्वरूप नहीं है उसको स्वरूप मान लेना। इसलिए इस अज्ञान और भ्रम के निवारण के लिए विवेक होना आवश्यक होता है।
तीन प्रकार के शरीर
स्वामीजी ने शरीरत्रय विवेक पर बोलते हुए कहा कि तीन प्रकार के शरीर होते हैं -
स्थूल शरीर - जो हमें दिखता है, पंचीकृत पंचमहाभूतों से बनता है, सुख-दुख भोगने का स्थान होता है और छः विकारों वाला होता है।
सूक्ष्म शरीर - जिसमें मन, बुद्धि, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच प्राण होते हैं, अपंचीकृत पंचमहाभूतों से बनता है। इन सबके देवता भी होते हैं। जिस भाव से हम अन्न ग्रहण करते हैं, उसका प्रभाव हमारे मन पर भी पड़ता है।
स्थूल शरीर - जब सूक्ष्म शरीर से अलग हो जाता है तो उसको हम मृत्यु कहते हैं।
कारण शरीर - जो अविद्या स्वरूप होता है और अन्य दोनों शरीरों का कारण होता है।
हमारी जागृत अवस्था में स्थूल शरीर कार्य करता दिखता है, स्वप्नावस्था में सूक्ष्म शरीर सक्रिय होता है और सुषुप्त अवस्था में ये दोनों शरीर सक्रिय नहीं होते, कारण शरीर होता है।
हमारा स्वरूप आत्मा है जो तीनों शरीरों से भिन्न है
स्वामीजी ने बताया कि चूँकि ये तीनों शरीर 'हमारे' या 'मेरे' हैं इसलिए मैं ये शरीर नहीं हो सकता। जो मेरा है वो मुझसे भिन्न है, वो मैं नहीं हो सकता। हम मन, इन्द्रियों, बुद्धि, शरीर आदि को मेरा बोलते हैं अतः हम उससे भिन्न हैं - हम आत्मा हैं। तीनों शरीर तीनों अवस्थाओं के साक्षी नहीं होते और परिवर्तनशील होते हैं इसलिए तीनों हमारे वास्तविक स्वरूप नहीं हैं। शरीरत्रय से भिन्न ब्रह्मस्वरूप, सच्चिदानंद स्वरूप आत्मा। आत्मस्वरूप का बोध होना ही ज्ञान है।
व्याख्यान को न्यास के यूट्यूब चैनल पर देखा जा सकता है। न्यास द्वारा प्रतिमाह शंकर व्याख्यानमाला का आयोजन किया जाता है जिसमें विश्व के प्रतिष्ठित विद्वान-संत जीवनोपयोगी आध्यात्मिक विषयों पर व्याख्यान देते हैं।

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