यूपी में पूरे पांच साल सीएम रहे तीन चेहरे योगी, मायावती और अखिलेश यादव पहली बार आमने-सामने
लखनऊ
प्रदेश में 18वीं विधानसभा के लिए हो रहा चुनाव इस मायने में भी विशिष्ट है कि पहली बार तीन ऐसे चेहरे अपनी-अपनी पार्टी की अगुवाई करते हुए आमने-सामने हैं जो पूरे पांच साल मुख्यमंत्री रहे हैं। मजे की बात यह भी है कि तीनों एक क्रम से मुख्यमंत्री रहे और तीनों ने पूर्ण बहुमत की सरकार का नेतृत्व किया। इस तरह मतदाताओं के पास तीनों के कार्यकाल का मूल्यांकन करते हुए उनकी पार्टी के प्रत्याशियों का चुनाव करने की सुविधा है।
बसपा सुप्रीमो मायावती चौथी बार वर्ष 2007 में मुख्यमंत्री बनीं। तब उनकी पार्टी अकेले दम पर 206 सीटें हासिल कर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। वर्ष 1984 में अपनी स्थापना के बाद पहली बार बसपा को अपने दम पर सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने में सफलता मिली थी। बसपा के वोटबैंक में भी भारी इजाफा हुआ था। इस चुनाव में प्रमुख प्रतिद्वंद्वी सपा को महज 97 व तीसरे नंबर पर रही भाजपा को 51 सीटों से संतोष करना पड़ा था। इस सफलता के बाद बसपा की सोशल इंजीनियरिंग राजनीतिक पंडितों के लिए शोध का विषय बन गई थी।
वर्ष 2012 के चुनाव में सपा ने बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को फेल करते हुए अकेले दम पर 224 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। चुनाव विश्लेषक अनुमान लगा रहे थे कि सपा सबसे बड़े दल के तौर पर उभरेगी। वह पिछली बार बसपा को मिली जीत से भी आगे निकल जाएगी, इसका अनुमान कोई नहीं लगा पा रहा था। चुनाव में दूसरे नंबर पर रही बसपा को 80 व तीसरे नंबर पर रही भाजपा को 47 सीटें मिली थीं। इस तरह पहली बार अपने दम पर बनी सपा की सरकार का नेतृत्व करने का मौका 38 वर्षीय अखिलेश यादव को मिला था। सबसे युवा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले अखिलेश ने पूरे पांच साल तक प्रदेश की बागडोर संभाली।
वर्ष 2017 के चुनाव में भाजपा की चुनावी गणित के सामने सपा-बसपा दोनों चित हो गए। प्रदेश में तीसरे नंबर की पार्टी हो चुकी भाजपा ने ऐसी छलांग लगाई कि उसने स्पष्ट बहुमत को प्रचंड बहुमत में तब्दील कर दिया। भाजपा ने अपने दो सहयोगी दलों के साथ मिलकर 325 सीटें जीत लीं, जिसमें 312 सीटें उसकी खुद की थीं। भाजपा को अपनी सीटों से ही तीन चौथाई बहुमत हासिल हो गया था। प्रचंड बहुमत की इस सरकार की अगुवाई करने का मौका योगी आदित्यनाथ को मिला। वह भाजपा के प्रदेश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री भी हैं, जो अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं। वर्ष 1991 में भी भाजपा स्पष्ट बहुमत के साथ 221 सीटें जीतकर सत्ता में आई थी, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके थे।
यह लोकतंत्र के लिए अच्छा है। जनता के सामने नेतृत्व के आधार पर उनके दलों को चुनने का विकल्प है। इससे जनता के सामने किसी भी दल को स्पष्ट जनादेश देने का दबाव भी बनता है। माना जाना चाहिए कि इस बार भी स्पष्ट बहुमत की ही सरकार बनेगी।
डॉ. वीएन अरोड़ा, पूर्व प्राचार्य

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