Wednesday, October 21st, 2026

गरीब-मजलूमों की हमेशा आवाज बनती रहेगी फैज की नज्में

भिलाई
अंर्तराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शायर दिवंगत फैज अहमद फैज के स्मृति दिवस पर दुर्ग-भिलाई और रायपुर के साहित्यकारों व उनके चाहने वालों ने फैज की याद में कार्यक्रम आयोजित करके उन्हें याद किया। जनवादी लेखक संघ, मूलनिवासी कला साहित्य और फिल्म फेस्टिवल तथा आल इंडिया सेल एससी एसटी इम्पलाइज फेडरेशन के संयुक्त तत्वावधान में उक्त कार्यक्रम गरिमा पूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।

भिलाई स्टील प्लांट के रिटायर जनरल मैनेजर एल उमाकांत की अध्यक्षता में अंचल के हिन्दी-उर्दू के प्रतिष्ठित कलमकारों ने शिरकत कर फैज को अपने-अपने तरीके से याद किया। रायपुर, दुर्ग व भिलाई से पधारे प्रमुख वक्ताओं में नासिर अहमद सिकंदर, डॉ. साकेत रंजन प्रवीर, मिर्जा हाफिज बेग, इजराइल बेग शाद व विश्वास मेश्राम उपस्थित हुए। वक्ताओं ने फैज को उनकी बहुआयामी रचनाधर्मिता और उनके गहरे सामाजिक सरोकारों की परिधी में देखने और उनकी कालजयी रचनाओं को युग सापेक्ष प्रासंगिकता की धरातल पर समायोजित करने का प्रयास किया और उनकी वर्तमान उपयोगिता को रेखांकित किया।

संचालन करते हुए विश्वास मेश्राम ने कहा कि जब तक धरती के किसी भी कोने में शोषितों, मजलूमों, निर्बलों और रोटी के लिए जद्दोजहद करते लोगों की मौजूदगी रहेगी तब तक फैज की नज्में उन गरीबों, शोषितों की आवाज बनती रहेगी। उपन्यासकार मिर्जा हफीज ने भिलाई में फैज पर केन्द्रित कार्यक्रमों को याद किया और नौजवानों को आकर्षित करने वाली फैज की रचनाओं के दिल में उतर जाने की याद दिलाई। उन्होंने उनकी बहुत प्रसिद्ध पंक्तियों मताए लौहो-कलम छिन गई तो क्या गम है, के खूने-दिल में डूबो ली हैं उंगलियां मैने को दोहराकर श्रोताओं की तालियां बटोर ली।

 

#voice of Faiz

Source : Agency

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