छत्तीसगढ़ में बदला मानसून का मिजाज: 50 साल में बदला ट्रेंड, अब अगस्त-सितंबर में ज्यादा बरसात
रायपुर
छत्तीसगढ़ में सुकमा और दंतेवाड़ा के किसान बारिश ज्यादा होने से परेशान है। जबकि जशपुर और बलरामपुर के किसान बारिश कम होने से चिंता में है। रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर के किसान हर साल आसमान देखकर यही सोचते हैं कि इस बार जून साथ देगा या नहीं।
पिछले 40 से 50 साल के बारिश के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में मानसून अब पहले जैसा नहीं रहा। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में उसकी चाल बदल रही है। बस्तर में बारिश बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं, जबकि सरगुजा संभाग के कई जिलों में बारिश घट रही है।
सबसे बड़ी बात यह है कि खेती की शुरुआत तय करने वाला जून अब सबसे ज्यादा अनिश्चित महीना बनता जा रहा है। ये केवल मौसम की कहानी नहीं है। इसका मतलब है कि किसान कब बुआई करेगा, तालाब में कितना पानी भरेगा, शहरों को कितना पानी मिलेगा, भूजल कितना रिचार्ज होगा और गर्मी के दिनों में पानी की किल्लत कितनी बढ़ेगी।
यानी बदलता मानसून सीधे लोगों की जिंदगी से जुड़ा हुआ मामला है। दिलचस्प बात यह है कि यह बदलाव ऐसे समय में दिख रहा है जब छत्तीसगढ़ एक और मानसून सीजन के मुहाने पर खड़ा है। इस साल भी किसानों की नजर पहली अच्छी बारिश पर टिकी है।
मौसम विभाग सामान्य मानसून की संभावना जता रहा है, लेकिन पिछले दशकों के आंकड़े बताते हैं कि अब केवल यह जानना काफी नहीं है कि कितनी बारिश होगी। असली सवाल यह है कि बारिश कब होगी और कहां होगी।
पहले पूरी तस्वीर समझिए
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। राज्य की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। लाखों किसान आज भी बारिश के भरोसे खेती करते हैं। प्रदेश में सिंचाई का दायरा बढ़ा जरूर है, लेकिन अब भी बड़ा हिस्सा वर्षा आधारित खेती पर टिका है।
यही वजह है कि मानसून यहां सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था का इंजन है। बारिश अच्छी हुई तो फसल अच्छी होगी, बाजार चलेगा, गांवों में नगदी आएगी। बारिश बिगड़ी तो असर खेत से लेकर मंडी और घर की रसोई तक दिखाई देता है।
पिछले कई दशकों के आंकड़ों का एनालिसिस बताता है कि राज्य में औसत बारिश भले बहुत ज्यादा नहीं बदली हो, लेकिन उसका पैटर्न बदल गया है। यही सबसे बड़ा संकेत है।
बस्तर भीग रहा, सरगुजा सूख रहा
एक समय था जब पूरे छत्तीसगढ़ को एक जैसी बारिश वाला राज्य माना जाता था। अब तस्वीर बदल रही है। दक्षिण छत्तीसगढ़ यानी बस्तर संभाग के कई जिलों में बारिश बढ़ने का रुझान दिखाई देता है।
सुकमा, नारायणपुर और कोंडागांव जैसे जिलों में लंबे समय के आंकड़े वर्षा बढ़ने की ओर इशारा करते हैं। सुकमा में बारिश बढ़ने का ट्रेंड राज्य में सबसे ज्यादा पाया गया है। इसके उलट सरगुजा, बलरामपुर, सूरजपुर और जशपुर जैसे जिलों में बारिश घटने का रुझान दिखाई देता है।
जशपुर में गिरावट सबसे ज्यादा दर्ज की गई है। यानी एक तरफ राज्य का दक्षिणी हिस्सा ज्यादा पानी की ओर बढ़ रहा है, दूसरी तरफ उत्तरी हिस्सा कम बारिश की ओर बढ़ता दिख रहा है।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) के मौसम वैज्ञानिकों द्वारा किया गया वर्षा का आकलन और लंबे समय के बारिश के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 50 सालों में छत्तीसगढ़ के अलग-अलग क्षेत्रों में मानसून के पैटर्न में बदलाव दर्ज किया गया है। यह बदलाव आने वाले सालों में जल प्रबंधन और खेती की रणनीति को पूरी तरह बदल सकता है।
खेती की शुरुआत तय करने वाला जून सबसे ज्यादा अनिश्चित
जून के महीने में खेत तैयार होते हैं। धान की नर्सरी डाली जाती है। बुआई की योजना बनती है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यही महीना सबसे ज्यादा अनिश्चित होता जा रहा है। कुछ सालों में जून में अच्छी बारिश हुई। कुछ सालों में बारिश बहुत कम रही। यानी किसान के लिए सबसे बड़ा जोखिम सीजन की शुरुआत में ही खड़ा हो जाता है।
यही वजह है कि कई बार किसान जल्दी बुआई कर देते हैं और बाद में बारिश रुक जाती है। दूसरी ओर कुछ सालों में मानसून देर से सक्रिय होता है और पूरा कृषि कैलेंडर पीछे खिसक जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में खेती की सबसे बड़ी चुनौती कुल बारिश नहीं, बल्कि जून की अनिश्चितता होगी।
मानसून पीछे खिसक रहा है?
आंकड़ों में एक और दिलचस्प पैटर्न दिखाई देता है। जून और जुलाई की बारिश में गिरावट के संकेत मिलते हैं, जबकि अगस्त और सितंबर में बढ़ोतरी का रुझान दिखाई देता है। सरल भाषा में समझें तो मानसून का वजन अब शुरुआती महीनों से हटकर बाद के महीनों की ओर जाता दिख रहा है।
पहले किसान जून और जुलाई के भरोसे खेती शुरू करते थे। अब कई बार अगस्त और सितंबर ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं। इस बदलाव का असर धान की फसल पर पड़ता है। शुरुआती समय में पर्याप्त पानी नहीं मिला तो पौध कमजोर होती है। वहीं कटाई के आसपास ज्यादा बारिश होने पर तैयार फसल को नुकसान हो सकता है।
क्या कहते हैं मौसम एक्सपर्ट
मौसम विज्ञान केंद्र, रायपुर की डायरेक्टर गायत्री वाणी के मुताबिक, मानसून के सीजन में सबसे ज्यादा बारिश जुलाई और अगस्त महीने में होती है। जून में बारिश को लेकर सबसे ज्यादा अनिश्चितता रहती है, क्योंकि यह पूरी तरह मानसून के प्रदेश में पहुंचने और उसकी प्रगति पर निर्भर करता है।
सबसे ज्यादा बारिश कहां, सबसे कम कहां?
छत्तीसगढ़ के अंदर भी बारिश का अंतर काफी बड़ा है। सुकमा आज भी राज्य का सबसे ज्यादा बारिश वाला जिला है। इसके बाद बस्तर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा और बीजापुर आते हैं।दूसरी ओर दुर्ग, बलौदाबाजार, मुंगेली, कबीरधाम और बेमेतरा अपेक्षाकृत कम बारिश वाले जिलों में शामिल हैं।
ज्यादा बारिश भी हमेशा अच्छी खबर नहीं
आमतौर पर माना जाता है कि जहां ज्यादा बारिश होती है वहां किसानों को फायदा होता होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। यदि 4 महीने में धीरे-धीरे बारिश हो तो खेती को फायदा मिलता है। लेकिन यदि कुछ दिनों में बहुत ज्यादा पानी गिर जाए तो उसका बड़ा हिस्सा बह जाता है।
इससे खेतों में कटाव बढ़ता है। छोटी नदियां और नाले उफान पर आ जाते हैं। गांवों का संपर्क टूटता है। फसलें जलभराव से प्रभावित होती हैं। यानी समस्या सिर्फ कम बारिश नहीं, बल्कि कम समय में ज्यादा बारिश भी है।
पानी की टंकी से लेकर तालाब तक असर
यह बदलाव रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और दूसरे शहरों में रहने वाले लोगों के लिए भी मायने रखता है। यदि बारिश का वितरण बिगड़ता है तो भूजल रिचार्ज प्रभावित होता है। इससे हैंडपंप, बोरवेल और छोटे जल स्रोत प्रभावित होते हैं।
गर्मी में पानी की किल्लत बढ़ सकती है। दूसरी ओर भारी बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ती है तो शहरी जलभराव की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं। यानी बदलते मानसून का असर गांव और शहर दोनों पर पड़ता है।

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