गांधी परिवार के गढ़ में जोड़-तोड़ की सियासत, जानें रायबरेली की 6 सीटों के समीकरण
रायबरेली
सौहार्द की धरती रायबरेली में सूफी काव्य का पहला ग्रंथ पद्मावत लिखा गया। यहीं ऋषि दालभ्य और महर्षि गर्ग ने गंगा के किनारे तप किया। होली के दिन छल से वीरगति को प्राप्त हुए राजा डाल-बाल देव की याद में सैकड़ों वर्ष बाद आज भी डलमऊ की होलिका दहन नहीं होता। उसी रायबरेली की राजनीति अब जाति-धर्म में बंट गई है। जाति के आधार पर चुनाव में वोट मांगने और देने का चलन चल निकला है। यह चुनाव भी अछूता नहीं है। जातियों के जोर के बीच हो रहे चुनाव में कई नेताओं और पूर्व मंत्रियों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है।
सुबह के 11 बजे हैं। रायबरेली शहर से बमुश्किल 6 किलोमीटर दूर लखनऊ प्रयागराज नेशनल हाईवे पर बाबा ढाबा पर ग्राहक तो यदा-कदा ही हैं पर 4-6 स्थानीय लोग चाय पीने की गरज से जमा है। इन्हीं में एक महादेव अखबार के पन्ने उलटते-पलटते हुए कह रहे हैं-आरपी (सपा प्रत्याशी आरपी यादव) का दोबारा टिकट मिले तै ई बार साइकिल फिर तेज दऊरै लागि। चाय सुड़कते हुए राउरदीन महादेव की बात काटते हुए कहते हैं कि कमल का कमजोर ना समझेव। लड़ाई इत्ती आसान नहीं। चुनावी चर्चा में चटखारे भरते हुए फत्ते भी बोल पड़े-पंजौ पकड़ िबना रहा हवे। इसी बीच ढाबा मालिक चिल्लाकर कहता है-देखो आलू उबले या नहीं। दाल चढ़ा देव। चुनावी चर्चा भी अधपके खाने की तरह बिना पके ही खत्म हो जाती है।
रास्ते में एक पब्लिक स्कूल की भव्य इमारत के अंदर साफ-सफाई तेजी से चल रही है। कोरोना की वजह से डेढ़ महीने से बंद चल रहे स्कूल की भव्य इमारत केंद्र साफ-सफाई का काम करते हुए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आपस में चुनाव की बातें भी करते जा रहे हैं। कह रहे हैं कि अबकी चुनाव पतै नहीं चलत। सबै दल वाले घर-घर मछिया (चक्कर काट) रहे हैं। सब अपै-अपै जातियै पर जोर मारि रहय। हम पंचन की समस्यन पर कोउनौ नहीं बोलि रहा। सदर विधानसभा क्षेत्र से सदर विधायक अदिति सिंह दोबारा मैदान में हैं। अबकी उनका निशान कमल है। पिछली बार पंजे से जीती थीं। कांग्रेस ने डॉ.मनीष चौहान को टिकट दिया है।
ऊंचाहार में रोचक मुकाबला हो रहा
जगतपुर कस्बे से दो किमी पहले नवाबगंज कस्बे के एक भट्ठे के बाहर बैठे रामकुमार कह रहे हैं कि भाजपा से अमरपाल मौर्या के आने के बाद सपा के मनोज पाण्डेय के लिए चुनाव आसान नहीं रहा। पहलवान और दिनेश कहते हैं कि कांग्रेस के अतुल सिंह को भी कमजोर न समझो। स्वामी प्रसाद मौर्य व भाजपा नेता अतुल सिंह के दल बदल के बाद यहां मुकाबला रोचक स्थिति में पहुंच गया है। भाजपा प्रत्याशी के बाहरी होने का मुद्दा छाया है। समस्याओं पर जातीय समीकरण हावी हैं।

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