अखबार से लड़ाई में पत्रकार की जीत , कोर्ट के आदेश पर मिलेगा पूरा बकाया वेतन
( अमिताभ पाण्डेय)
भोपाल , अपनी खबर
लोकप्रिय कहावत है कि अंत भला तो सब भला। ये कहावत भोपाल वरिष्ठ पत्रकार श्राजेन्द्र मेहता के संदर्भ में सटीक बैठती है। उन्होंने अपने हक अधिकार के लाई 32 साल लंबी कानूनी लड़ाई नवभारत अखबार से लड़ी। अखबार प्रबंधन और फरियादी श्री मेहता की तरफ से प्रस्तुत तमाम दलील , तर्क और तथ्य को सुनने के बाद विद्वान न्यायधीश फैसला पत्रकार के पक्ष में सुनाया।
श्री मेहता ने हमारे संवाददाता को बताया कि मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने नवभारत प्रबंधन की लेबर कोर्ट के आदेश के खिलाफ लगी याचिका को खारिज कर दिया है। अब नवभारत को वर्ष 1990 से लेकर अब तक का पूरा वेतन पत्रकार राजेंद्र मेहता को देना होगा।
दरअसल बात सन 1990 की है जब श्री मेहता नवभारत भोपाल में उप सम्पादक के पद पर पदस्थ थे। प्रबंधन ने उनके बेहतर काम को देखते हुए उन्हें भाचावत वेतनमान देकर 2 हजार 700 रुपये प्रतिमाह वेतन फिक्स कर दिया।
ये बात वहाँ काम कर रहे कुछ सहकर्मियों को रास नहीं आई, जिसके बात उन्होंने मालिकों के कान भरना शुरू कर दिए। परिणामस्वरूप 14 जून 1990 को प्रबंधन ने अकारण ही श्री मेहता की सेवाएं समाप्त कर दीं। अपना काम निष्ठा और ईमानदारी से कर रहे राजेंद्र को ये बात नागवार गुजरी ।
उन्होंने नवभारत मालिकों के इस तुगलकी फरमान के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने की जिद पाल ली। इस दौरान वरिष्ठ पत्रकारों और कई साथियों ने उन्हें समझाया भी कि नवभारत के खिलाफ लड़ना कितना मुश्किल है। गौरतलब है कि 90 के दशक में मध्यप्रदेश में नवभारत का स्वर्णिम काल था ।
उन दिनों राजनीति से लेकर प्रशासन तक हर जगह नवभारत का बड़ा प्रभाव था। अखबार के खिलाफ न तो शिकायत करने की हिम्मत होती थी । न ही कोई शासन में शिकायत को सुनना या कार्यवाही करना चाहता था।
इसके बाद भी राजेंद्र मेहता ने अखबार से अपना हक अधिकार हासिल करने के लिए नियम कानून से लड़ाई शुरू कर दी ।उन्होंने वर्ष 1990 में भोपाल श्रम न्यायालय में नवभारत प्रबंधन के खिलाफ अवैध सेवा समाप्ति का वाद दायर कर दिया।
उनकी तरफ से वकील स्वर्गीय शरद शुक्ला ने इस मामले को पूरी ताकत के साथ अदालत में लड़ा। भोपाल श्रम न्यायालय में 17 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार मार्च साल 2007 में लेबर कोर्ट ने श्री मेहता के हक में अवार्ड पारित करते हुए उन्हें पिछले समस्त बकाया वेतन के साथ बहाल करने के निर्देश दिए। नवभारत प्रबंधन ने इस फैसले को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर में चुनौती दी।
हाइकोर्ट में ये मामला करीब 15 साल तक चला। हाल ही में 12 अक्तूबर 2022 को मामले में आदेश सुनाते हुए उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने नवभारत की याचिका खारिज कर दी। विद्वान न्यायधीश ने अपने निर्णय में लेबर कोर्ट भोपाल के वर्ष 2007 के आदेश को उचित माना है।
असुविधा , अभाव और विपरीत पारिवारिक स्थिति के बीच लगभग 32 साल के संघर्ष उपरांत अब कोर्ट के आदेश से श्री मेहता पिछला वेतन और समस्त हितलाभ भी मिलेंगे। श्री मेहता के अनुसार ये निर्णय उन निराशावादी लोगों के मुंह पर तमाचा है, जो कहते हैं कोर्ट में लड़ाई लड़ने से कुछ हासिल नहीं होता।
गौरतलब है कि जबलपुर हाइकोर्ट में भी श्री मेहता की ओर से शुरुआत में वरिष्ठ अधिवक्ता सुजय पॉल ने मामले में पक्ष रखा। श्री पॉल बाद में मप्र उच्च न्यायालय में ही न्यायाधीश बन गए, जिसके बाद अशोक श्रीवास्तव रूमी और स्वप्निल खरे ने मामले में पैरवी की और केस को अंजाम तक पहुंचाया।
श्री राजेन्द्र मेहता वर्तमान में स्टेट वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के संयोजक हैं। उनसे मोबाइल नंबर 8450029501 पर संपर्क किया जा सकता है। वे पूरे प्रदेश में पत्रकार और गैर पत्रकार साथियों की मदद को तत्पर रहते हैं। उम्मीद की जाना चाहिए कि न्यायालय का यह फैसला अपने हक अधिकार के लिए लड़ने वाले पत्रकारों का मार्गदर्शन करेगा।

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