प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित और संवर्धित किया जाना आवश्यक -प्रमुख सचिव शुक्ला
भोपाल
प्रमुख सचिव संस्कृति और पर्यटन शिव शेखर शुक्ला ने कहा कि प्रदेश की ऐतिहासिक एवं विरासतिये धरोहरों को संरक्षित और संवर्धित किया जाना आवश्यक है। इससे आने वाली पीढ़ी हमारे गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सकें। हेरिटेज को टूरिज्म का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की दिशा में कार्य करना है। प्रमुख सचिव शुक्ला होटल पलाश में इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज, (Indian National Trust for Art and Cultural Heritage) द्वारा तीन दिवसीय कंजर्वेशन ऑफ हेरिटेज बिल्डिंग विषय पर आधारित कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। शुक्ला ने कहा कि प्रदेश में स्थित खजुराहो, माण्डू, चंदेरी, ओरछा जैसे ऐतिहासिक धरोहरें हैं। मध्यप्रदेश का हेरिटेज अमूल्य है। विदेशों में 17वीं शताब्दी की इमारतों को विरासत धरोहर मानकर उनका संरक्षण एवं संवर्धन किया जाता है। जबकि हमारे देश में सेकेंड और थर्ड सेंचुरी में निर्मित इमारतें है। इनके संरक्षण के लिए आमजन में जागरुकता की आवश्यकता है।
प्रमुख सचिव शुक्ला ने कहा कि मध्यप्रदेश के ग्वालियर, ओरछा, चंदेरी, माण्डू, खजुराहो, विदिशा, रायसेन, सहित मालवा, बुन्देलखण्ड, विंध्य और महाकौशल क्षेत्र के अन्य नगरों में सैकड़ों की संख्या में ऐतिहासिक भवन एवं स्मारक, भव्य किले, गढ़ियाँ और बावड़ियाँ हैं। यह ऐसी धरोहरें हैं, जिन्हें अब दोबारा नहीं बनाया जा सकता है। अगर यह विलुप्त हो गई तो नई पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी इसे देख नहीं सकेंगी। इसलिए इन धरोहरों का अनुरक्षण कर उनका संवर्द्धन करने की ज़रूरत है। इन धरोहरों का संरक्षण और संवर्धन कर इन्हें पर्यटन के लिए कैसे सहभागी बनाया जा सकता है, इस पर विचार किया जाना चाहिये।
प्रमुख सचिव शुक्ला ने कहा कि ने प्रदेश में पर्यटन के साथ संस्कृति की भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। कल्चरल हेरिटेज, ट्राइबल हेरिटेज और बिल्ड हेरिटेज( Build Heritage) हमारे प्रदेश के इतिहास और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। शुक्ला ने विश्व प्रसिद्ध खजुराहो के मंदिरों का उदाहरण देते हुए कहा कि 11वीं शताब्दी में निर्मित खजुराहो के मंदिरों की स्थापत्य कला केवल मानव श्रम से ही संभव हो सकी है। उस काल में बड़े-बड़े पत्थरों पर नक्काशी कर अद्भुत मूर्तियों को उकेरा गया है, यह मूर्तिकला का बेजोड़ नमूना है। उस काल में वर्तमान समय जैसे अत्याधुनिक उपकरण नहीं थे। उसके बावजूद हजारों सालों से प्रदेश में यह इमारतें और स्मारक खड़े हैं। इनके आर्किटेक्चर से बहुत कुछ सीखने को मिलता है और हमें इनसे प्रेरणा लेना चाहिए।
प्रमुख सचिव शुक्ला ने कहा कि प्रदेश में स्थित यह ऐतिहासिक इमारतें कुछ कहती है और प्रत्येक इमारतों के पीछे कुछ कथानक और कहानियाँ है। उसे सही ढंग से दुनिया के सामने लाने की आवश्यकता है, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी को अपने इतिहास का सेंस ऑफ प्राइड (Sense of pride) का अनुभव एवं गौरव हो। शुक्ला ने कार्यशाला में भाग ले रहे पर्यटन निगम और पुरातत्व विभाग के इंजीनियर्स, आर्किटेक्ट्स, कंसल्टेंट एवं असिस्टेंट इंजीनियर्स से उम्मीद की कि तीन दिवसीय इस कार्यशाला के माध्यम से मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक धरोहरों के अनुरक्षण के कार्यों में उपयोग में लाये जाने वाली विधाओं एवं सामग्री के उपयोग की जानकारी से लाभान्वित होंगे।
कार्यशाला को राज्य पर्यटन विकास निगम के प्रबन्ध संचालक एस विश्वनाथन एवं मध्यप्रदेश टूरिज्म बोर्ड की अपर प्रबन्ध संचालक तथा मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग की आयुक्त, श्रीमती शिल्पा गुप्ता ने भी संबोधित किया।
सत्र के समापन पर पर्यटन निगम के मुख्य अभियंता डी.एस. यादव ने बताया कि कार्यशाला से पर्यटन और पुरातत्व विभाग के अधिकारियों को भवनों के अनुरक्षण एवं संवर्द्धन कार्यों की जानकारी होंगी। वर्तमान में प्रदेश में निर्माणाधीन भवनों और इमारतों के निर्माण में भी इस कार्यशाला में विशेषज्ञों के सुझाव और अनुभव अवश्य ही लाभकारी होंगे।
कार्यशाला में इंटेक( INTACH) की डायरेक्टर डॉ. पारुल मंजुल सहित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पुरातत्व अधिकारी डॉ. रमेश यादव, इनटेक की कंजर्वेशन आर्किटेक्ट सुस्नेहा एवं एएसआई के सेवानिवृत्त कंजर्वेशन इंजीनियर ए.के. सोनी ने भी प्रदेश की धरोहरों के अनुरक्षण एवं संवर्धन की बारीकियाँ बताने के साथ नवीन निर्माण में पुरानी तकनीक का उपयोग के विषय पर चर्चा की।

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