Monday, October 26th, 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब ऑनलाइन मिलेगी मेडिको-लीगल और पोस्टमार्टम रिपोर्ट

प्रयागराज
 इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब मेडिको-लीगल और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को ऑनलाइन सीसीटीएनएस पर ही मिल जाएगी। एनआईसी ने पूरा मैकेनिज्म सेटअप कर मेडलीप आर पोर्टल को सीसीटीएनएस से इंटीग्रेट कर दिया है। ऐसा जैरुन्निशा की अर्जी पर न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल के आदेश के क्रम में हुआ। यह जमानत अर्जी गत 13 अक्टूबर को निस्तारित हो चुकी थी लेकिन कोर्ट ने इसे एमईडीएलईएपीआर और सीसीटीएनएस के इंटीग्रेशन के लिए पेंडिंग रखा था।

कोर्ट के बीते 13 अक्टूबर के आदेश के अनुपालन में एनआईसी के डिप्टी डायरेक्टर जनरल शशिकांत शर्मा, यूपी पुलिस के एडीजी (टेक्निकल) भगवान एस श्रीवास्तव, मेडिकल हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर की प्रिंसिपल सेक्रेटरी वी हेकाली झिमोमी, हेड ऑफ एमईडीएलईएपीआर टीम राहुल जैन, सीएमओ प्रयागराज डॉ अरुण कुमार तिवारी और एसआरएन हॉस्पिटल में इंचार्ज पोस्टमार्टम हाउस डॉ राजीव रंजन कोर्ट में मौजूद रहे।

शशिकांत शर्मा और राहुल जैन ने बताया एनआईसी ने एमईडीएलईएपीआर को सीसीटीएनएस के साथ इंटीग्रेट करने का पूरा काम कर दिया है। अब पुलिस विभाग एफआईआर, केस क्राइम नंबर लिंक्ड रिक्वेस्ट भेजेगा तो सभी मेडिको लीगल रिपोर्ट, जिसमें पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी है, अपलोड हो जाएगी। डॉ राजीव रंजन ने बताया कि प्रयागराज में 15 माई 2025 से 22 अक्टूबर तक 3707 पोस्टमार्टम हुए, लेकिन पुलिस ने सिर्फ दो केस में ही रिक्वेस्ट भेजी। कारण पूछने पर एडीजी टेक्निकल ने कहा कि वह सभी पुलिस अफसरों को सेंसिटाइज करेंगे कि संबंधित अस्पताल/मॉर्चरी को एफआईआर लिंक्ड रिक्वेस्ट भेजें। साथ ही बताया कि कुछ टेक्निकल मुद्दे हैं, जिससे पुलिस सही से रिक्वेस्ट नहीं भेज पा रही है।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि चार नवंबर को सुबह 11 बजे प्रिंसिपल सेक्रेटरी मेडिकल हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर, के ऑफिस में तीनों अधिकारी बैठक कर प्रभावी इम्प्लीमेंटेशन के लिए उपाय तय करें। साथ ही उम्मीद जताई कि तीनों अधिकारी समय पर मेडिको लीगल रिपोर्ट पोर्टल पर भेजने, इंटीग्रेशन और अपने-अपने विभाग के अधिकारियों को सेंसिटाइज करने की समस्या सुलझा लेंगे।

जातिसूचक गाली के बिना नहीं चलेगा एससी/एसटी एक्ट में केस
उधर, हाईकोर्ट ने एक अन्य आदेश में कहा है कि किसी मामले में सिर्फ शिकायतकर्ता का एससी-एसटी वर्ग का होना एक्ट लगाने के लिए काफी नहीं है, जब तक यह साबित न हो कि अपमान जाति के आधार पर जानबूझकर शर्मिंदा करने की नीयत से किया गया। इसके लिए जातिसूचक गाली/अपमानजनक भाषा का विशिष्ट आरोप एफआईआर में होना जरूरी है। यह आदेश न्यायमूर्ति संतोष राय ने अमरनाथ चौधरी की अपील पर दिया है। सिद्धार्थनगर के इटवा थाने में दर्ज केस में चार्जशीट दाखिल होने के बाद स्पेशल जज सिद्धार्थनगर के संज्ञान/सम्मन आदेश को चुनौती दी गई थी।

अपीलार्थी ने फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनवाया था, जिसकी शिकायत करने पर उसने मारपीट की। दलील दी गई कि एफआईआर में कोई जातिसूचक गाली या अपमानजनक शब्द अपीलार्थी पर आरोपित ही नहीं है। कोर्ट ने कहा एफआईआर पढ़ने से ही लगता है कि कोई जातिगत गाली या अपमानजक भाषा अपीलार्थी द्वारा प्रयोग ही नहीं की गई जिससे लगे कि एससी/एसटी होने के कारण अपमानित किया गया। कोर्ट ने अपीलार्थी को एससी/एसटी एक्ट के आरोप से मुक्त कर दिया और कहा कि मारपीट का केस चलेगा।

 

#Allahabad High Court

Source : Agency

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