अपर्णा की काट के लिए आखिरी चरण में अखिलेश ने डिंपल को उतारा
लखनऊ
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। सातवें चरण का मतदान सात मार्च को होना है। चुनाव के अंतिम चरण में सभी दलों ने अपनी ताकत झोंक दी है। इसी को देखते हुए पूर्व सीएम अखिलेश यादव की पत्नी और पूर्व सांसद डिंपल यादव भी चुनावी मैदान में उतर गई हैं। एक तरफ जहां डिंपल यादव को सपा पूर्वांचल की रैलियों में भेज रही है क्योंकि प्रत्याशियों की तरफ से उनकी डिमांड आ रही है। उसी तरह बीजेपी ने मुलामय की छोटी बहु अपर्णा यादव को भी मैदान में उतारा है। अपर्णा यादव भी बीजेपी के लिए लगातार रैलियां कर रही हैं। ऐसा माना जा रहा है कि अपर्णा यादव को काउंटर करने के लिए ही अब डिंपल यादव जनसभाओं में जा रही हैं।
पूर्वांचल में डिंपल यादव ने संभाला मोर्चा
इस बार अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने भी खूब मोर्चा संभाला है उन्होंने पूर्व के अपने दौरे के दौरान रैलियां भी कीं और भारी भीड़ को आकर्षित किया। चूंकि डिंपल खुद राजपूत समुदाय से हैं, इसलिए उनका प्रभाव पूर्व में ठाकुर वोटों पर भी पड़ा। यह अखिलेश के लिए राहत की बात है। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने पांचवें चरण के मतदान के बाद डिंपल यादव ने समाजवादी पार्टी के प्रचार अभियान की कमान संभाल ली है। उनकी रैलियों में भारी भीड़ उमड़ी। ये दोनों चरण उत्तर प्रदेश के उन इलाकों में थे, जो अपने मिजाज और सामाजिक समीकरणों के हिसाब से बाकी उत्तर प्रदेश से अलग हैं। सामंती जातियों-ब्राह्मण-ठाकुर के अलावा अन्य जातियां भी यहां पर्याप्त संख्या में हैं।
सातवें चरण के प्रचार का आज अंतिम दिन
अब सिर्फ एक चरण का मतदान बाकी है। दरअसल, 27 फरवरी को हुए पांचवें चरण के मतदान के बाद दोनों मुख्य पार्टियों के शीर्ष नेताओं की सांसें चल रही थीं, अब क्या होगा? क्योंकि बाकी की 111 सीटें निर्णायक लगती थीं। इन दो चरणों में जातिवाद और जातियों के बीच आपसी लड़ाई, वर्चस्व के लिए माफिया युद्ध, पिछले पांच वर्षों की योगी सरकार की सत्ता विरोधी लहर और ब्राह्मणों के गुस्से की भी परीक्षा होनी थी। इसके अलावा अखिलेश यादव की पुरानी पेंशन योजना की बहाली जैसी घोषणाओं का असर भी यहां देखने को मिला क्योंकि सरकारी नौकरी वाले लोग भी इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा हैं। इनमें से छठा चरण गुरुवार को पूरा हो गया और अब कुल 54 सीटें बची हैं और चुनाव में महज एक तरह की औपचारिकता ही रह गई है। क्योंकि अंतिम चरण तक मतदाता अपने द्वारा पारित चरणों के आधार पर ही वोट डालते हैं।
वोट बंटे तो सत्ता पक्ष को होगा फायदा
योगी सरकार के लिए राहत की बात यह रही कि गुरुवार को हुए छठे चरण के मतदान में कई सीटों पर चुनाव तिरछे तो कभी चतुष्कोणीय रहे। यानी नाराज वोट बंट जाता है, जिसका फायदा सत्ता पक्ष को जाता है। लेकिन जहां भी आमने-सामने की लड़ाई हुई वहां भाजपा और सपा उम्मीदवारों के पसीने छूट रहे थे। चाहे वह बांसडीह हो कुशीनगर हो या सिद्धार्थ नगर। बांसडीह में भाजपा के समर्थन से चुनाव लड़ रहे विपक्ष के नेता राम गोविंद चौधरी और केतकी सिंह के बीच मुकाबला था जबकि कुशीनगर की फाजिलनगर सीट से स्वामी प्रसाद मौर्य ने चुनाव लड़ा था, जिन्होंने हाल ही में भाजपा के मंत्री को छोड़ दिया था। सपा में शामिल हो गए। यहां बीजेपी के उपेंद्र कुशवाहा उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे थे। इसी तरह सिद्धार्थ नगर की इटावा सीट पर सपा के वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडेय और भाजपा के सतीश द्विवेदी के बीच सीधा टकराव हुआ।
जाट और मुस्लिम मतदाता तय करेंगे सरकार का भाग्य
यही स्थिति सातवें और अंतिम चरण में होने जा रही है। लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में कौन जीतेगा, यह कहना बेहद मुश्किल है। 10 फरवरी को पहले चरण के मतदान के दौरान जो चुनाव का माहौल था, वह आज नहीं है. पहले और दूसरे चरण में कुछ सीटों पर भाजपा और कई पर सपा-रालोद गठबंधन पर भारी पड़ती दिखी। जाट बहुल सीटों पर रालोद के जयंत चौधरी के प्रति मतदाताओं की स्वाभाविक सहानुभूति थी। फिर भी, पहले चरण में जिन 58 सीटों पर मतदान हुआ था, उनमें ज्यादातर जाट बहुल थीं और मुस्लिम संख्या भी पर्याप्त थी। लेकिन दूसरे चरण में सहारनपुर, रामपुर, मुरादाबाद, संभल और अमरोहा में मुस्लिम वोटर बीजेपी का गणित बिगाड़ रहे थे, जबकि बरेली और बदायूं में हालात अलग थे। यानी एक तरह से दोनों चरणों में कोई भी पीछे नहीं रहा। लेकिन तीसरे, चौथे और पांचवें चरण में स्थिति अलग थी।

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