Monday, October 19th, 2026

रिपोर्ट के मुताबिक लगातार गिरावट की ओर है कोयला आधारित परियोजनाओं के लिए कर्ज देने का सिलसिला

नई दिल्ली 
कोयला आधारित परियोजनाओं के लिए कर्ज देने का सिलसिला लगातार गिरावट की ओर है। हालांकि दो वर्ष तक गिरावट के बाद वर्ष 2020 में इसमें हल्की बढ़ोत्तरी देखी गई। अब भी यह वर्ष 2017 में इस रिपोर्ट में पाए गए 60767 करोड़ रुपए (9350 मिलियन डालर) के मुकाबले 85 प्रतिशत नीचे बना हुआ है। पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन क्‍लाइमेट ट्रेंड्स और सेंटर फार फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी (सीएफए) द्वारा कोयला बनाम अक्षय ऊर्जा- एक वित्तीय विश्लेषण शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2020 में भारतीय स्‍टेट बैंक अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं का सबसे बड़ा वित्‍तपोषक था जबकि पीएफसी और उसकी सहयोगी संस्था आरईसी सरकारी स्‍वामित्‍व वाली ऐसी संस्थाएं हैं जिन्होंने वर्ष 2020 में कोयले से बिजली उत्पादन की परियोजनाओं को धन उपलब्‍ध कराया। सीएफए के अधिशासी निदेशक जो. एथियाली कहते हैं, "भारत में वित्त पोषण का रुझान उसी तरह का है, जैसा हम इस वक्त वैश्विक स्तर पर देख रहे हैं। कोयले से चलने वाली नई परियोजनाओं के लिए वित्तपोषण को वापस लिए जाने का सिलसिला बढ़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं प्रतिष्ठा, आर्थिक पहलू तथा विश्वास से संबंधित जोखिमों के डर से कोयला आधारित परियोजनाओं के लिए धन देने से परहेज कर रही हैं।

भारत के सातवें सबसे बड़े वाणिज्यिक बैंक यानी फेडरल बैंक ने इस साल कोयला आधारित परियोजनाओं के लिए धन नहीं देने की नीति का ऐलान किया। वह ऐसा करने वाला भारत का पहला बैंक है। पीएफसी को उसके नक्शेकदम पर चलते हुए कोयले को छोड़कर अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं का ही वित्तपोषण करना चाहिए। वर्ष 2020 में अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के प्राथमिक वितरण में साल दर साल 11 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखी गई। वर्ष 2020 में एसबीआइ द्वारा अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं को दिए जाने वाले कर्ज में 2019 के मुकाबले 334 प्रतिशत ज्यादा की जबरदस्त वृद्धि देखी गई है। पीएफसी ने वर्ष 2020 में अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए 2160 करोड़ रुपए (289 मिलियन डालर) का ऋण दिया जो कोयला आधारित परियोजनाओं के लिए उसके द्वारा उपलब्ध कराए गए वित्त पोषण का करीब 60 प्रतिशत है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने कहा "अध्ययन से यह पता लगता है कि 450 गीगावाट अक्षय ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत को इस दशक में लगभग 38 लाख करोड रुपए या 500 बिलियन डालर के निवेश की जरूरत है।

ऐसा करने के लिए न सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय वित्तपोषण, बल्कि घरेलू वित्तीय संस्थाओं को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। ऐसा लगता है कि पीएफसी और आरईसी अक्षय ऊर्जा के मुकाबले कोयला आधारित परियोजनाओं को ज्यादा ऋण दे रहे हैं। यह केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्यों के अनुरूप नहीं है। सरकार ने कोयले से चलने वाले बिजलीघरों को चरणबद्ध ढंग से बंद करने का संकल्प व्यक्त किया है और दीर्घकाल में नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। जैसे-जैसे अक्षय ऊर्जा सस्ती और बनाने में आसान होती जाएगी, पारंपरिक संस्थानों को यह एहसास होगा कि अधिक कोयला परियोजनाओं को वित्तपोषित करना ठीक नहीं है।
 

 

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Source : Agency

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