ISRO के पूर्व वैज्ञानिकों का कमाल, स्काईरूट बना अरब डॉलर का स्पेस स्टार्टअप
हैदराबाद
कई दशकों तक, भारत में स्पेस एक्सप्लोरेशन का काम सिर्फ सरकारी संस्था ISRO ही करती थी। लंबी वोटिंग लिस्ट और ज्यादा लागत की वजह से कमर्शियल सैटैलाइट लॉन्चिंग कई लोगों की पहुंच से बाहर थी।
हालांकि, अब एक शांत क्रांति हो रही है, जिसे ISRO के दो पूर्व वैज्ञानिकों ने शुरू किया है। उन्होंने स्पेस सेक्टर के सबके लिए सुलभ बनाने के मकसद से सरकारी एजेंसी से निकलने का फैसला किया।
2018 में, पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाके ने हैदराबाद में 'स्काईरूट एयरोस्पेस' की शुरुआत की। उनका मकसद सरल लेकिन साहसी थाष सैटेलाइट लॉन्चिंग को कमर्शियल फ्लाइट बुक करने जितना ही आसान और सस्ता बनाना।
रॉकेट 'विक्रम-S' का सफल लॉन्च
आज, चंदाना CEO और डाका COO के तौर पर 1,000 से ज्यादा एक्सपर्ट्स की टीम को लीड कर रहे हैं। इन दोनों ने पारंपरिक भारतीय स्पेस विरासत और स्टार्टअप की तेजी के बीच के अंतर को सफलतापूर्वक कम किया है।
2022 में 'मिशन प्रारंभ' के साथ रचा इतिहास
इस कंपनी ने 2022 में 'मिशन प्रारंभ' के साथ इतिहास रचा और भारत का पहला प्राइवेट तौर पर विकसित रॉकेट 'विक्रम-S' सफलतापूर्वक लॉन्च किया। इस कामयाबी ने साबित कर दिया कि देश की प्राइवेट कंपनियां भरोसेमंद एयरोस्पेस हार्डवेयर बना और लॉन्च कर सकती हैं।
इस अहम उपलब्धि से पहले ही, स्काईरूट ने 2020 में भारत के पहले प्राइवेट रॉकेट इंजन 'रमन-1' और 2021 में क्रायोजेनिक इंजन 'धवन-1' का सफल परीक्षण करके सबका ध्यान अपनी ओर खींचा था। तकनीकी रफ्तार बनी हुई है और कंपनी ने हाल ही में अपने मुख्य ऑर्बिटल व्हीकल 'विक्रम-1' के लिए जरूरी टेस्ट पूरे कर लिए हैं।
स्काईरूट की वैल्यूएशन 1.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर
इस तकनीकी कामयाबी ने बड़े ग्लोबल निवेशकों को आकर्षित किया है। स्काईरूट ने GIC और टेमासेक जैसे बड़े इंटरनेशनल निवेशकों से 160 मिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाए हैं, जिससे इस स्टार्टअप की वैल्यूएशन 1.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई है।
जैसे-जैसे भारत अपने स्पेस सेक्टर को कमर्शियल कंपनियों के लिए खोल रहा है, चंदाना और डाका यह साबित कर रहे हैं कि देश कम लागत वाली सैटेलाइट लॉन्चिंग के लिए एक प्रमुख ग्लोबल हब बन सकता है, जिससे ग्लोबल स्पेस रेस हमेशा के लिए बदल जाएगी।

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