Saturday, October 24th, 2026

11 वीं कारीगर विज्ञान कांग्रेस

भोपाल
कोरोना वायरस महामारी का चर्म शिल्प और इससे जुड़े कारीगरों पर प्रतिकूल असर पड़ा है। चर्म शिल्प एक कला है, जो अनेक पीढ़ियों से चली आ रही है। शिल्प के दो गुण हैं, पहला कलात्मकता और दूसरा उपयोगिता। आज के दौर में नई पीढ़ी की रूचियों के अनुसार उत्पाद बनाने की जरूरत है। मशीन की तुलना में कारीगर के हाथ का बना प्रॉडक्ट अधिक मूल्यवान है।

ये विचार फुटवियर डिजाइन एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट, कोलकाता की श्रीमती बासुमित्रा घोष मुखर्जी ने आज कारीगर विज्ञान कांग्रेस में ऑनलाइन संगोष्ठी के दौरान व्यक्त किये। उन्होंने बताया कि बाजार में उत्पाद की गुणवत्ता का सबसे ज्यादा महत्व है। चर्म शिल्प कारीगर छोटे-छोटे नुस्खों से गुणवत्ता में सुधार कर सकते हैं। श्रीमती मुखर्जी ने कहा कि इस क्षेत्र में सूक्ष्म,लघु एवं मध्यम उद्यमों की बहुत अच्छी भूमिका है। उन्होंने बताया कि छोटे कारीगर धन के अभाव में प्रचार- प्रसार में पीछे रह जाते हैं और लोगों के बीच उनके अच्छे उत्पाद पहुंच नहीं पाते।

राष्ट्रीय शिल्प संस्थान, जयपुर के विशेषज्ञ डॉ. बासु वन्सित ने लौह शिल्प पर व्याख्यान में बताया कि लोहे से बने प्रॉडक्ट में जंग लग जाती है। उन्होंने बताया कि जंग अथवा रस्ट लगने से रोकने के लिए इलेक्ट्रोफोरेसिस का उपयोग किया जाता है।

कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद उद्बोधन ग्रामीण प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग केंद्र के प्रभारी समीर कुमरे ने दिया। मेपकॉस्ट द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में लगभग 80 प्रतिभागियों ने भाग लिया।

 

#विज्ञान कांग्रेस

Source : Agency

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