बैस की सक्रियता पर तिरछी नजर
रायपुर
किसी समय भाजपा के कद्दावर छत्तीसगढि?ा नेता रहे रमेश बैस इन दिनो त्रिपुरा के राज्यपाल पद पर आसीन हैं,चूंकि यह संवैधानिक पद है इसलिए राजनीतिक मंचों से वे पूरी तरह दूरी बनाकर रखे हुए हैं,लेकिन छत्तीसगढ़ के प्रति उनका लगाव अभी भी कम नहीं हुआ है। वे लगभग हर माह-दो माह में छत्तीसगढ़ प्रवास पर आ जाते हैं, तब एक साथ तमाम कार्यक्रमों में उनके शामिल होने का शेड्यूल रहता है। राज्य की हर घटनाक्रम,सुख और दुख के विषयों पर भी त्रिपुरा से उनका बयान आ जाता है। हर प्रवास में वे छत्तीसगढ़ के राज्यपाल से भी सौजन्य मुलाकात करने पहुंच जाते हैं।
इस प्रवास के दौरान छत्तीसगढ़ मनवा कुर्मी क्षत्रिय समाज के महाधिवेशन में भी मुख्य अतिथि के रूप में वे शामिल हुए तो पुराने राजनीतिक दिनों की याद ताजा करते हुए बिरादरी के लोग कह बैठे,पार्टी ने भले ही बैस को राज्यपाल बना दिया है लेकिन आज छत्तीसगढ़ में भाजपा की जो स्थिति हैं और कांग्रेस मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की ठेठ छत्तीसगढि?ा नेता के रूप में लोकप्रियता बढ़ी है। कहीं न कहीं दिल्ली के नेताओं को लग रहा होगा कांग्रेस से निपटने छत्तीसगढि?ा नेता की जरूरत थी,जो चूक उनसे हो गई है। कुछ लोग यह भी कहते नजर आए कि गुटों में बंटी भाजपा को एका करने व छत्तीसढि?ां फैक्टर को भुनाने के लिए अगले विधानसभा चुनाव से पहले बैस को वापस लाना ही होगा। पहले भी कुछ जन प्रतिनिधि जो राज्यपाल के पद पर रह चुके थे,दोबारा राजनीति में आए। कांग्रेस के स्व.मोतीलाल वोरा भी इस संदर्भ में उदाहरण हैं। आज भी बैस का छत्तीसगढ़ प्रवास होता है तो सभी वर्ग के लोग उनसे भेंट-मुलाकात करने के लिए पहुंचते हैं। चेंबर जैसी व्यापारिक संस्था का चुनाव लड़ रहे दोनों ही प्रमुख पैनल के प्रत्याशी सौजन्य भेंट ही सही आर्शिवाद मांगने बैस के पास पहुंचे थे जो इस बात का गवाह है।
निगम के पार्षद चुनाव से शुरू राजनीति के बाद पूरे कैरियर में लगभग 37 साल का सफर पूरी तरह बेदाग रहा। इस बीच कई मर्तबे वे केन्द्रीय मंत्री भी रहे,लेकिन पार्टी नेतृत्व में आए बदलाव के बाद वे भी प्रभावित हो गए। हालांकि कहीं न कहीं पार्टी उनकी वरिष्ठता को नकार नहीं पायी इसीलिए राज्यपाल बनाकर भेजना पड़ा। खैर..,राजनीति में सब कुछ संभव है।

पाठको की राय