प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने ली भारत से कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख हासिल करने की शपथ
काठमांडू
नेपाल में राजनीतिक भूचाल आया हुआ है। फिर भी विपक्ष के साथ-साथ अपनी ही पार्टी के निशाने पर खड़े और संसद भंग करने के बाद फिर से सरकार बनाने की जुगत में लगे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली भारत के साथ मोर्चा खोलने से बाज नहीं आ रहे हैं। रविवार को नैशनल असेंबली की मीटिंग में ओली ने भारत से कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख का कब्जा अपने हाथ में लेने की प्रतिज्ञा दोहराई है। दिलचस्प बात है कि ओली पर इस बात के आरोप लगते रहे हैं कि सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों, बढ़ती बेरोजगारी और कोरोना वायरस की महामारी को रोकने में विफल रहने के लिए ओली भारत के साथ सीमा विवाद को हवा देते रहते हैं।
माई रिपब्लिका के मुताबिक ओली ने दावा किया है कि सुगौली समझौते के मुताबिक महाकाली नदी के पूर्व पर स्थित ये तीनों क्षेत्र नेपाल के हैं। उन्होंने कहा है कि भारत से कूटनीतिक बातचीत के जरिए इन्हें वापस लिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद से भारतीय सेना जहां तैनात हुई, नेपाल के शासकों ने कभी उन क्षेत्रों को हासिल करने की कोशिश नहीं की है। चीन के विशेष दूत का नेपाल दौरा देश के आंतरिक मामलों में ड्रैगन के सीधे दखल के रूप में देखा जा रहा है। जिनपिंग के खास दूत सबसे पहले प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और उनके प्रमुख प्रतिद्वंदी पुष्प कमल दहल प्रचंड से मुलाकात कर सुलह करवाने का प्रयास करेंगे। इसके लिए काठमांडू में तैनात चीनी राजदूत हाओ यांकी ने पहले से ही पीएम ओली और दहल से मिलने का समय मांगा है। बताया जा रहा है कि दहल ने गूओ येझोउ से मुलाकात करने की हामी भर दी है, जबकि ओली की तरफ से अभी तक कोई जवाब नहीं दिया गया है।
इससे पहले नेपाल के हुमला इलाके में चीन के जमीन कब्जाने की घटना के बाद भी काठमांडू की सड़कों पर बड़ी संख्या में नेपालियों ने विरोध प्रदर्शन किया था। इस दौरान लोगों ने चीनी दूतावास के बाहर गो बैक चाइना के नारे भी लगाए थे। चीन ने नेपाल के हुमला इलाके में कम से कम 9 बिल्डिंग्स का निर्माण किया है। हालांकि नेपाल सरकार ने अपने ही अधिकारियों के रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा था कि चीन ने कोई भी कब्जा नहीं किया है। गूओ येझोउ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बेहद खास माने जाते हैं। ये चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय विभाग के उप मंत्री भी हैं। इनकी ही पहल पर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ ऑनलाइन ट्रेनिंग सेशन आयोजित किया था। इसके अलावा ये चीन की तरफ से कम्युनिस्ट देशों से संपर्क के भी प्रमुख हैं। इस बार गूओ येझोउ के साथ चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल भी नेपाल पहुंचा है।
नेपाली अखबार काठमांडू पोस्ट के मुताबिक गत महीने में जब नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में तनाव अपने चरम पर था, उस समय चीनी राजदूत हाओ यांकी ने पार्टी के शीर्ष नेताओं और राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी से मुलाकात की थी। हालांकि, दोनों ही पक्षों में शांति बनाने के कई प्रयास करने के बाद भी हायो यांकी को कामयाबी नहीं मिली। इधर नेपाल को अपने हाथ से निकलता देख जिनपिंग ने डैमेज कंट्रोल के लिए तुरंत गूओ येझोउ को नेपाल जाने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार के देश का नया नक्शा जारी करने पर बहुत से लोग परेशान हो उठे। ओली ने कहा कि पहले के शासक 'भारत के अतिक्रमण' के खिलाफ बोलने से डरते थे और अब उनकी सरकार इन क्षेत्रों को वापस लेने का काम कर रही है। आपको बता दें कि मई 2020 में भारत के साथ सीमा विवाद होने के कुछ वक्त बाद बिना उसे सुलझाए नेपाल सरकार ने देश का नया नक्शा जारी कर दिया था और विवादित क्षेत्रों को अपने हिस्से में दिखाया था।
ओली ने यह भी दावा किया कि उनकी सरकार ने भारत और चीन, दोनों के साथ द्विपक्षीय संबंध मजबूत करने की दिशा में काम किया है और इन्हें नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। पीएम ने चीन के सथ रोड कनेक्टिविटी बेहतर करने के लिए अरानिको हाइवे के विस्तार का जिक्र किया। साथ ही यह भी बताया कि तिब्बत में केरुंग के साथ कनेक्टिविटी के लिए टनल बनाने के लिए सर्वे किया जा रहा है। ओली ने कहा कि कुछ हफ्ते पहले नेपाल पहुंचे भारत और चीन के उच्च अधिकारियों के दौरों को लेकर चिंता नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि वह भारत के साथ संबंध अच्छे करना चाहते हैं। इसलिए अपनी चिंताएं साफ-साफ उसके सामने रख रहे हैं।

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