Thursday, October 22nd, 2026

महिला किसी की गुलाम नहीं है,उसे साथ रहने को मजबूर नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्‍ली
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि महिला किसी की निजी संपत्ति नहीं है। अदालत ने कहा कि पत्‍नी को जोर-जबर्दस्‍ती कर पति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मंगलवार को एक सुनवाई के दौरान अदालत ने यह टिप्‍पणी की। एक शख्‍स ने याचिका लगाई थी कि अदालत उसकी पत्‍नी को आदेश दे कि वह फिर से उसके साथ रहने लगे। इसपर जस्टिस एसके कौल और जस्टिस हेमंत गुप्‍ता की बेंच ने कहा, "आपको क्‍या लगता है? क्‍या महिला किसी की गुलाम है जो हम ऐसा आदेश पारित कर देंगे? क्‍या पत्‍नी निजी संपत्ति है जो उसे आपके साथ जाने का निर्देश दिया जा सकता है?"

फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में दिया था फैसला
इस पूरे विवाद की जड़ में दांपत्‍य अधिकारों की बहाली का एक आदेश है जो गोरखपुर की फैमिली कोर्ट ने 2019 में दिया था। महिला ने कहा कि 2013 में शादी के बाद से ही पति ने उसे दहेज को लेकर प्रताड़‍ित किया, मजबूरत वह अलग रहने लगी। 2015 में जब उसने गुजारा-भत्‍ता के लिए केस दायर किया तो गोरखपुर की अदालत ने पति को उसे 20,000 रुपये महीना देने का आदेश सुनाया। पति ने इसके बाद दांपत्‍य अधिकारों की बहाली के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की। अदालत ने पति के पक्ष में फैसला दिया।

दांपत्‍य अधिकारों की बहाली का फैसला होते ही पति फिर से अदालत चला गया। इस बार उसकी आपत्ति गुजारा-भत्‍ते के भुगतान को लेकर थी कि जब वो पत्‍नी के साथ रहने को तैयार है तो गुजारा-भत्‍ता किस बात का। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उसकी याचिका ठुकरा दी‍ जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।


बार-बार अदालत से यही मांग करता रहा पति
अपने बचाव में, महिला ने कहा कि पति का यह पूरा 'खेल' गुजारा-भत्‍ता चुकाने से बचने के लिए गहै। महिला ने कहा कि उसका पति फैमिली कोर्ट तब गया जब उसे ऐसा करने का आदेश हुआ। मंगलवार को सुनवाई के दौरान पति के वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को उसकी पत्‍नी को मनाकर वापस उसके साथ भेजना चाहिए, खासतौर से तब जब फैमिली कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला दिया है। बार-बार यही मांग करने के बाद अदालत को कहना पड़ा, "क्‍या कोई महिला निजी संपत्ति है? क्‍या पत्‍नी एक गुलाम है? आप हमसे आदेश पारित करने को कह रहे हैं मानो उसे ऐसी जगह भेजा जा सकता है जहां वह नहीं जाना चाहती, जैसे कोई गुलाम।" बेंच ने दांपत्‍य अधिकारों को बहाल करने की याचिका खारिज कर दी।

साल 2018 में भी शीर्ष अदालत ने ऐसी ही टिप्‍पणी की थी। तब एक महिला जिसने अपने पति के खिलाफ क्रूरता की शिकायत की थी, ने कहा था कि वह पति के साथ नहीं रहना चाहती। जबकि पति का कहना था कि पत्‍नी के साथ रहना चाहता है।

 

 

#महिला किसी की गुलाम

Source : Agency

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